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लिवइन रिलेशनशिप व विवाह पूर्व सेक्स बनाम भारतीय मानस

Posted On 25 Mar, 2010 में

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लिव इन तथा विवाह पूर्व सेक्स का मसला एक बार फिर से चर्चा में तब आ गया जबकि उच्चतम न्यायालय द्वारा दक्षिण भारतीय अभिनेत्री खुशबू के मामले में यह टिप्पणी की गयी कि जब दो लोग साथ रहना चाहते हैं तो इसमें अपराध क्या है. लेकिन न्यायालय द्वारा आगे यह जोड़ दिए जाने से कि “माइथोलॉजी के मुताबिक भगवान कृष्ण और राधा भी साथ रहे थे” ने भारत के अंतर्मन को झकझोर डाला है.

 

हर समाज या समुदाय की कुछ निहित विशेषताएं होती हैं और उसी के अनुसार वहॉ प्रतीक गढ़ लिए जाते हैं. समाज का संयुक्तीकरण इन्हीं लक्षणों या प्रतीकों के मूल्य स्थापित किए जाने के क्रम में होता रहता है. जो समाज इन्हें अस्वीकार कर देता है उसका वजूद एक इकाई के रूप में खत्म होने लगता है.

 

भारतीय समाज सदा से एक मर्यादित, मानवीय मूल्यों और नैतिक संहिताओं पर आधारित समाज रहा है. परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी परंपरा और जीवन पद्धति का प्रवाह एक निश्चित गति से होता रहा है. समाज को एकीकृत रखने और तनाव मुक्त जीवन जीने देने में इसका मुख्य योगदान है.
अब यदि अपेक्स कोर्ट या अन्य कोई संगठन या संस्था इस जीवन पद्धति और इसके प्रतीकों का मजाक बनाए तो बात बेहद गंभीर हो जाती है. भारत की पावन भूमि पर ऐसे खयालात लाना और सोचना भी जघन्य अपराध की श्रेणी में आता है. तब कैसे कोई न्यायाधीश या सरकार का कोई अन्य अंग राधा-कृष्ण को सामान्य मानवीय मुद्दे के बीच घसीट लेता है जो ना सिर्फ हमारी आस्था के प्रतीक हैं बल्कि हमारी जीवन पद्धति के प्रमुख आयाम भी हैं.

 

न्यायालय हो या कोई और किसी सामाजिक मुद्दे पर विचार व्यक्त करने के पूर्व उसे इस बिन्दु पर जरूर सोचना चाहिए कि क्या भारत में अनैतिक रिवाजों को मान्यता मिल सकेगी? क्या हमारा समाज इतना नंगा हो चुका है कि उसे अनियंत्रित स्वतंत्रता की जरूरत है?

 

आखिर इतनी अराजक स्वतंत्रता की जरूरत किसे है?

 

समाज के ऐसे भोगी जो तमाम तरह के दुष्कृत्यों में लिप्त रहते हुए भोग के नए-नए साधनों की खोज में रहते हैं बस उन्हें ही चाहिए ऐसी स्वतंत्रता. मेट्रोज़ में जीवन की एक नई शैली विकसित हो रही है, जिसमें घर-परिवार से दूर लड़के-लड़कियां जॉब कर रहे हों या पढ़ाई, उन्हें अपनी शारीरिक-मानसिक भूख को मिटाने के लिए ऐसे अनैतिक संबंधों की जरूरत पड़ रही है. तमाम लड़कियां नासमझी में और कुछ तो अपनी भौतिक आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए लिवइन का सहारा लेती हैं.

 

कुल मिलाकर यह मसला किसी नैसर्गिक आवश्यकता से नहीं जुड़ा है बल्कि भोगवाद का अतिरेक है कि सार्वजनिक मंच पर इस तरह की बातें सुनने को मिल रही हैं कि लिवइन रिलेशनशिप वक्त और हालात की जरूरत है.

 

मैं कई बार लिवइन रिलेशन का समर्थन करने वालों से पूछता हूं कि यदि उनके घर-परिवार की लड़कियां इस प्रकार का संबंध रखना चाहें तो उन्हें खुशी होगी? जवाब हमेशा नहीं में ही मिला. तब क्या समझा जाए? यानी यदि मामला अपने घर का हो तो खराब बात है और यदि दूसरों के घर का हो तो फिर मजा लेने में हर्ज कैसी?

 

अगर बात करें संविधान की तो वह तो स्वयं ही अनियंत्रित स्वतंत्रता को अस्वीकार करता है. यानी ऐसी कोई भी स्वतंत्रता जो दूसरों को हानि पहुंचाती हो उसे तो खुद ही निरस्त हो जाना चाहिए. तब लिवइन जैसी स्वच्छंदता जो समाज की सुस्थापित व्यवस्था को हानि पहुंचाने में सक्षम है, को मानवाधिकार के रूप में परिभाषित करना या इसे वक्त-हालात की जरूरत बताकर प्रोत्साहित करना कहॉ तक ठीक है.

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9 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ram के द्वारा
September 30, 2011

बहुत अच्छा आलेख

kmmishra के द्वारा
April 3, 2010

इस मुद्दे पर न तो प्रिंट मीडिया में कुछ छपा और नहीं इलेक्ट्रिानिक मीडिया ने ही कुछ कहा । माननीय सर्वोच्च न्यायालय के माननीय जज साहेब लगता है अब न्यायपालिका का एम. एफ. हुसैनीकरण करने पर उतारू हो गये हैं । उन्हें राधा-कृष्ण के सम्बन्धों की जानकारीं सिर्फ गीतगोविन्द जैसी पुस्तकों से मिली होगी । भागवत कथा के श्रवण का उन्हें कभी सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ । कानून अपनी जगह है और दर्शन और आध्यात्म अपनी जगह । जरूरी नहीं कि जिस चीज की आपको जानकारी न हो उस क्षेत्र में जबरदस्ती टांग अड़ा देनी चाहिये ।

suchi के द्वारा
March 27, 2010

सर्वोच्च न्यायालय के माननीय मुख्य न्यायाधीश द्वारा diya गया fainsala बिलकुल sahi हैं kyoki आज देश में जितनी वैश्यावृति हैं uske पीछे ka मुख्य कारण पुरुष मानसिकता हैं. इस कानून के aane या न आने से पुरुष महिला को वैश्यावृति के dhande में लाना नहीं chor देंगे. एक औरत अकेले रंडी नहीं हो सकती, उसको इस dhande में लाने वाले पुरुष ही हैं jo apne karm को छिपाने के लिए महिला को रंडी नाम दे देते हैं. जब पुरुष दो logo को एक साथ rahne को बुरा मानता हैं तो ऐसे kam करता ही kyo हैं. इसका mukahya कारण समाज ka डर हैं. yadi समाज के डर से पुरुष द्वारा खुद को बचाने के लिए से महिला को बुरा bana देना ही पुरुष मानसिकता हैं तो समाज में kuch परिवर्तन कर के पुरुष मानसिकता में badlav कर देना ही अच्छा हैं जिससे कारण बहुत से लोगो को अपनी जिन्दगी से hath नहीं धोना parega.

    suchi के द्वारा
    March 27, 2010

    मैं आपसे सहमत हू.

Mukesh Goyal के द्वारा
March 26, 2010

सर्वोच्च न्यायालय के माननीय मुख्या न्यायाधीश महोदय को शायद भगवान् कृष्ण के बारे में ठीक से जानकारी नहीं है | श्री कृष्ण जैसा योगी इस जगत में कोई नहीं हुआ है | राधा कृष्ण का सम्बन्ध आत्मिक था न कि शारीरिक | रामसेतु के मामले में जिन लोगों को राम के होने के शाक्ष्य चाहिए थे उन्हें कृष्ण के बारे में जानकारी होने पर आश्चर्य होता है | लिव इन रिलेशन कुछ भोगवादी लोगों का निजी मामला है जिसे किसी भी भगवान् के साथ जोड़ना उन काम पिपासु लोगों को खुली मान्यता देने की कुचेष्टा भर से ज्यादा कुछ नहीं है | इसके बाद इसे लोगों द्वारा खुले आम सड़कों पर सेक्स की छूट देने की भी मांग की जाएगी उसे भी मान लेना |

Parveen Sundriyal के द्वारा
March 25, 2010

जब सदाचारियो ने valentine day और दुसरे छिछोरेपन पर आपत्ति जताई तो उन्हें कोसा गया. उनको रंडियों ने जनानी चडिया भेजी और समाज चुप रहा. आज इन रंडियों का जमाना आ गया है और वो सबको अपने जैसा बनाएगी ताकि कोई उनको कुछ न कह सके. बचा सकते हो तो अपने बच्चो को बचाओ मगर पहले अपने संस्कार वापस जगाओ तब बात बनेगी.

    Himanshu के द्वारा
    March 26, 2010

    waah!! bilkul sahi farmaya, khari-khari kehne ki kam logo mein hi himmat hoti hai.

NIKHIL PANDEY के द्वारा
March 25, 2010

संक्षेप में सटीक बात कहना ही आपकी खूबी है इसलिए आपके विचारो का इंतजार रहता है ..मेरी समझ में नहीं आता है की कोर्ट ने ये निर्णय देने से पहले करोडो हिन्दुओ की भावनाओ को क्यों नहीं समझा …या तो कोर्ट को कृष्ण राधा का ज्ञान नहीं है.. या फिर वह लिव इन रिलेशन का मतलब सिर्फ साथ रहना समझती है….. सर्वोच्च न्यायलय के न्यायधिशो से हम ये उम्मीद नहीं कर सकते की उन्हें ये भी ज्ञान न हो की हमारा सामाजिक ढाचा कैसा है , और ऐसे निर्णयों से ऐसे कमेन्ट से उसपर क्या प्रभाव पड़ेंगे………….. आप इतनी स्वतंत्रता मत दे दो नई पीढ़ी को की वह अपना ही घर जला दे…. मुझे लगता है की कोर्ट को भारतीय समाज की उच्च पारंपरिक सामाजिक भावना और कोर्ट के प्रति विशवास का मान रखते हुए अपना ये कमेन्ट वापस लेना चाहिए और और इसके लिए देश से माफ़ी मांगना चाहिए ……………

    sumit के द्वारा
    September 9, 2010

    Kya koi hai jo vivaah-poorv youn-sambandho ke Bhaarteeya samvidhaan me avaidh ghoshit karne ke liye tark de sake, call kariye 09425605432 sumit Bhopal, Avaidh ghoshit kiya jana ati aawashyak hai


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