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समलिंगी जमात की पर्सनल च्वॉयस

Posted On 23 Nov, 2010 में

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अभी कुछ दिन पूर्व मेरी एक महिला मित्र ने समलिंगियों और खासकर गे यानी पुरुष समलिंगियों पर अचानक चर्चा छेड़ दी. थोड़ा असहज था उनसे वार्ता कर पाता इस मुद्दे पर किंतु जिस वक्त उन्होंने गे लोगों के प्रति सहानुभूति का रुख अख्तियार किया मुझे सचेत हो जाना पड़ा. उनका कहना है कि गे व्यक्तित्व एक प्रकार आंतर्द्वन्दिक व्यक्तित्व है. एक असहज, एक टूटा हुआ व्यक्तित्व, खंडित चित्त……… जो अंत में व्यवस्था और समाज द्वारा पीड़ित हो रहा है. उनकी राय में समलिंगियों के प्रति समाज को सहानुभूति की बजाय प्यार का रास्ता अख्तियार करना चाहिए. उनकी भी समाज में आम लोगों की भांति स्वीकृति होनी चाहिए.


मेरी मित्र इस मसले पर काफी संवेदनशील लग रही थीं इसलिए वाकई तत्काल कोई उत्तर नहीं देना चाहता था मैं. कोई भी ऐसा सही किंतु कठोर उत्तर ताकि उनको दुख ना हो. लेकिन जब मैने देखा कि वे इस विषय पर बुद्धि से ज्यादा भावना को तवज्जो दे रही हैं तो मुझे प्रतिवाद करना ही पड़ा.  हालांकि इसके लिए मुझे उनकी वक्र दृष्टि का शिकार भी होना पड़ा जिससे मुझे काफी तकलीफ हुई.


समलिंगी समाज में अधिकांश मानसिक विकृति के शिकार हैं. कुछ ऐसे भी हैं जो केवल विचित्र अनुभवों को लेना चाहते हैं, जिनकी लालसा तरह-तरह के ऐन्द्रिक सुख की होती है. यानी मामला ज्यादातर भोग से जुड़ा है ना कि जरूरत से. आपको गांवों में भी तमाम ऐसे लोग मिल जाएंगे जो बच्चों को अपना शिकार बनाते हैं और उनका यौन शोषण करते हैं. आप इस उदाहरण को केवल भोग की श्रेणी में रख सकते हैं. मेट्रोज में तमाम ऐसे युवा मिल जाएंगे जो स्त्रियों जैसी भाव-भंगिमा अख्तियार करते हैं और पुरुषों को ही आकर्षित करने की चेष्टा में लगे रहते हैं. हॉस्टल्स में रहने वाली कई लड़कियां जाने-अनजाने इस बुरी प्रवृत्ति की शिकार हो जाती हैं.


लेकिन सबसे ज्यादा खतरनाक बात तो तब होती है जबकि समलिंगी संबंधों की खुल के हिमायत की जाने लगती है और ऐसे लोगों के लिए अधिकार की मांग की जाती है. न्यायालय की समलिंगी संबंधों पर राय सामने आते ही दिल्ली के जंतर-मंतर पर जब तमाम समलिंगियों ने मिल कर अपनी खुशी का इजहार किया था तो ये जाहिर हो गया कि आज समलिंगियों की जमात कुछ ज्यादा ही मुखर है. अब लाज, डर और संकोच उनके मन से दूर हो चुका है और अब वे पूरे समाज को अपने लपेटे में ले लेने को आतुर हैं. यह जमात अपनी विकृति से पूरे समाज को ग्रसित कर देना चाहती है जिससे वह बेखौफ होकर अपनी वासना पूरी कर सके.


वास्तव में समलिंगी एक मानसिक व्याधि से ग्रसित होते हैं और इसका इलाज किया जाना चाहिए. लेकिन ये इलाज आखिर है क्या. यदि आप चाहेंगे कि इनको केवल काउंसिलिंग से या किसी दवा से ठीक किया जाए तो आप भ्रम में हैं. क्यूंकि ये इस प्रकार का रोग नहीं है. ये रोग तो है अति स्वतंत्रता की चाहत का. ये रोग है भोग की अति का. ये रोग  है मनोरंजन के नए आयाम तलाशने का. इसलिए इसके इलाज के लिए कोई अन्य उपाय काम नही आएगा. इसका केवल और केवल एक ही उपाय है वो है दंड का. भयानक दंड का, सामाजिक दंड सहित शारीरिक दंड का. और इसके सिवाय आप किन्हीं और तरीकों से इन्हें समझाना चाहेंगे तो ये आप पर ही भारी पड़ जाएंगे. इनके पास भी मानवाधिकार का वही घिसा-पिटा तर्क, इनके पास भी इंडिविजुअल आईडेंटिटी और पर्सनल च्वायस जैसे तर्क हैं. बड़ा मुश्किल है इनकी पर्सनल च्वायस की बात को खारिज करना. इसलिए किसी भ्रम में मत रहिए कि ये सुधर जाएंगे. अपने समझाने की काबिलियत अपने पास रखिए और वास्तव में आप चाहते हैं कि समलिंगी जमात निर्मूल हो जाय तो इनके लिए सहानुभूति की बजाय दंड के ख्याल पैदा कीजिए.

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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

विवेक के द्वारा
September 11, 2013

पांडेजी, आपके विचार पढकर बडा खेद हुआ. समलिंगी होना कोई पाप नहीं है. वे भी सभी कि तरह महसूस करते है, प्यार करते है और समाज को कोई बाधा भी नहीं पहुंचाते. दो बालिग व्यक्ति अपने घर के अंदर अपने प्यार का किसी भी तरह इजहार करें इससे आपको क्या बाधा आ सकती है? वे किसीभी जाती, धर्म, भाषा, प्रदेश, लिंग के हो, उनके प्यार के संबंधोसे आपकी क्या शारीरिक, आर्थिक, सामाजिक हानि हो रही है? हाँ, अगर आपकी मानसीक हानि हो रही है क्योंकि आपको समलिंगी पसंद नहीं, तो आपकी इस पीड़ा की कोई पर्वाह नहीं करता. आप कहते हैं की समलैंगिकता प्रकृति के खिलाफ है, तो फिर क्यों जानवरोंमें भी समलैंगिकता पाई जाती है. आप कहते हैं समलैंगिकता पश्चिमी सभ्यता की देन है, तो फिर क्यों कामसूत्रमें भी समलिंगी संबंधोकी खुलके चर्चा और वर्णन किया गया है? क्यों खजुराहो की कामशिल्पोंमे समलिंगी और उभयलिंगी जोड़े दिखाए गए है? आप कहते हैं की समलैंगिकता एक मानसिक बीमारी है, मैं कहता हूँ, आपको एक गंभीर मानसीक बीमारी हुई है- तिरस्कार और घृणा की. बिना किसी वैज्ञानिक ज्ञान के आप हास्यास्पद विधान लिखते जा रहे हैं. क्या आपको पता नही समलिंगी होना हमारे DNA कि कुंडली मे लिखा होता है? क्या आपको पता नही, के लाख कोशिशोंके बावजूद किसी समलिंगी को भिन्नलिंगी और भिन्नलिंगी को समलिंगी बनाया नहीं जा सकता? क्या आप नहीं जानते के कल आपकी बेटी या बेटा भी समलिंगी होनेकी खबर आपको दे सकता है? या आप ये सब बाते जानते हुए भी लोगोंको आपके ब्लॉगपोस्ट की जरिये गुमराह करना चाहते है? समाजमें विभिन्न भेंदोंके आधारपर दुश्मनी फैलाना चाहते है, जैसे की जाती, धर्म, भाषा, प्रदेश और लैंगिकता के आधारपर दुश्मनी? खैर छोड़िये, अपने लेखनसे समाज में प्यार और भाईचारा बढ़ाना चाहिए. आप ठीक उसी तरह समलिंगीयोंको सजा देने की बात कर रहे है, जैसे हिटलर यहुदियोंको, तालिबान महिलाओं और अन्य धर्मियोंको, और राज ठाकरे उत्तर भारतीयोंको. इसे नाज़ीवाद या फैसिजम कहते है. मुझे आपसे कोई व्यक्तिगत शत्रुता नहीं, लेकिन आपके इन बंद डिब्बीमें कैद विचारोंसे है. आजतक समाजने महिलाओं, गुलामों, काले लोगों, दलितों , अपनेसे भिन्न धर्म के लोगों और समलिंगीयोंपरभी बहोत अत्याचार किये हैं. महिलाओंको हमने सती बना के जलाया है, ८-१० की आयु में उन्हें वधु बनाकर बलात्कार किये है. लेकिन विश्व का और भारतवर्ष का भाग्य भी मंगल था की हमें राजा राममोहन रॉय, महात्मा फुले, सावित्रीबाई फुले, आगरकर, छत्रपति शाहू, पेरियार स्वामी, डॉ. आम्बेडकर जैसे समाजसुधारक मिले. जिन्होंने खुले विचारोंसे एक नये आधुनिक भारतीय समाज की नीव रची. स्वतंत्रताके बाद हम इन विचारों और आदर्शोंको भूल तो गए है, लेकिन हमारी खुद की बुद्धिभी नहीं इस्तेमाल क्र रहे की खुले विचारोंसे मेलजोल से रह कर विश्व को एक रहने लायक जगह बना सके. सत्यमेव जयते!!

HIMANSHU BHATT के द्वारा
November 26, 2010

पाण्डेय जी ….. मेरे विचार से यह एक मानसिक समस्या ज्यादा है……. इसके सहनिभुतिपुर्वक समाधान की ज्यादा आवश्यकता है….. बजे दंड देने के…….

SATISH YADAY के द्वारा
November 25, 2010

I am not sure but if it is its a really shame for us .”Indians r poor but India is not a poor country”. Says one of the Swiss bank directors. He says that “280 lac crore” of Indian money is deposited in Swiss banks which can be used for ‘tax less’ budget for 30 yrs. Can give 60 crore jobs to all Indians. From any village to Delhi 4 lane roads. Forever free power suply to more than 500 social projects. Every citizen can get monthly 2000/- for 60 yrs. No need of World Bank & IMF loan. Think how our money is blocked by rich politicians. We have full right against corrupt politicians. Itna forward karo ki pura INDIA padhe. Take this seriously, You can forward jokes, then why not this? Be a responsible citizen! Pls help :) plz forward it to all

chaatak के द्वारा
November 24, 2010

स्नेही श्री पाण्डेय जी, काफी दिनों बाद आपने मंच पर दर्शन दिए, बड़ी शिद्दत से आपकी जरूरत महसूस हो रही थी| ‘भयभीत कंठ से राष्ट्रीयता और मिथ्या विचारों से प्रेम का गान नहीं हो सकता’ बताने के लिए भी किसी भयमुक्त कंठ की आवश्यकता थी| जब तक कमजोर नैतिक चरित्र के लोग हमारे बीच मौजूद हैं तब तक इन अनैतिक शक्तियों को समर्थन किसी न किसी रूप में मिलता रहेगा| मैं आपकी बात से पूर्णतयः सहमत हूँ कि- “सका केवल और केवल एक ही उपाय है वो है दंड का. भयानक दंड का, सामाजिक दंड सहित शारीरिक दंड का. और इसके सिवाय आप किन्हीं और तरीकों से इन्हें समझाना चाहेंगे तो ये आप पर ही भारी पड़ जाएंगे.” अच्छे बेबाक लेख पर बधाई!

    rkpandey के द्वारा
    November 25, 2010

    प्रिय चातक जी, राष्ट्र और समाज के हित के लिए सभी को भयमुक्त कंठ सच को सामने लाने का प्रयास करना चाहिए लेकिन अधिकांश आजकल तथाकथित उदारवादी बन बैठे हैं. हालांकि वे तुच्छ लाभों के लिए निन्दात्मक कर्म अपनाने में नहीं हिचकते लेकिन जब बात संस्कृति-परंपरा, राष्ट्र और समाज के हितों की होती है तो चुपचाप पीछे हट जाते हैं. हॉ ये भी है कि इन कायरों का गुट बड़ा हो गया है और किसी भी नैतिक बात या विचार को रुढिवादी या प्रतिक्रियावादी कह के समवेत स्वर में खारिज भी करते हैं. देश में ऐसे तत्वों की बहुलता होती जा रही है, नव युवा वर्ग भ्रमित है, मार्गदर्शन कर सकने वाली अनुभवी और बौद्धिक पीढ़ी भी इसी रंग में रंगती जा रही है. कई बार तो भ्रम होने लगता है कि हम क्या हैं और क्या होते जा रहे हैं. मामले कई हैं जिन पर आपसे चर्चा होती रहेगी.

R K KHURANA के द्वारा
November 24, 2010

प्रिय पाण्डें जी, मैं आपको बात से बिलकुल सहमत हूँ ! यह प्रकृति के भी विरुद्ध है ! परन्तु यह पश्चिम की हवा ने इसको टूल देकर विकृत कर दिया है ! इस पर रोक लगनी ही चाहिए. ! राम कृष्ण खुराना

    rkpandey के द्वारा
    November 25, 2010

    आदरणीय चाचा जी, समर्थन के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया.

bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
November 24, 2010

प्रिय श्री आर.के. पांडेय जी, बात आपनें बिलकुल ठीक लिखी है । समाज में पनप रहे इन नए नए रिश्‍तों को चाहे कुछ भी नाम दिया जाए सभी एक विकृति की तरह ही हैं । विकृति का इलाज होना भी जरूरी है । दवा मर्ज के अनुसार दी जाती है । इसलिए आपकी दवा दंड उचित ही प्रतीत हो रही है । अरविन्‍द पारीक

    rkpandey के द्वारा
    November 25, 2010

    आदरणीय पारीक जी, बेहद खुशी हुई जो आपने अपनी प्रतिक्रिया जाहिर की. विकृतियों का खुलके विरोध करना ही होगा अन्यथा ऐसे तत्व पूरे समाज को गन्दा करने में माहिर हैं. इन्हें दंड का भय दिखाना समय की जरूरत है.

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
November 23, 2010

पांडे जी…….. ये बड़े खेद का विषय है की हम हर उस जगह सहानुभूति प्रकट करते हैं जहा उसकी जरूरत नहीं……… ओर जहां जरूरत है वहाँ हम इस से परहेज करते हैं……….. सड़क के किनारे सोने वाले गरीब लोगों से हमको सहानुभूति नहीं है………. दो जून की रोटी के लिए कचरा उठाने वालों से हम सहानुभूति नहीं रखते …….. पर इस तरह के लोगों से रखते हैं……………..क्यो क्योकि इसमे अधिकतर सभी लोग सम्पन्न वर्ग के हैं………. लंबे समय के बाद वापसी व इस सार्थक लेख के लिए बधाई……. …

    rkpandey के द्वारा
    November 25, 2010

    प्रिय पियूष जी, वर्तमान में आप जंक्शन के मंच के सर्वाधिक सक्रिय ब्लॉगर हैं इसलिए आपकी प्रतिक्रिया पाकर खुशी मालूम हो रही है. ये सच है कि कई बार हम दिल में गलत बातों का विरोध दबाए रख जाते हैं. आज जरूरत है मुखर विरोध की. आपका आभार.


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