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महात्मा गांधी पर घिनौने आरोप !

Posted On: 29 Mar, 2011 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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न्यूयॉर्क टाइम्स के पूर्व कार्यकारी संपादक लेखक जोसेफ लेलिवेल्ड ने अपनी किताब ग्रेट सोलः महात्मा गांधी एंड हिज़ स्ट्रगल विद इंडिया में गांधी जी और यहूदी आर्किटेक्ट व बॉडीबिल्डर कैलनबाक के संबंधों के बारे में कई घिनौना दावा किया है. लेखक अपनी दबी ग्रंथियों को निकालने की चेष्टा में सारी मर्यादा ताक पर रखते हुए भ्रामक और बेबुनियाद आरोप लगा कर प्रसिद्धि हासिल करने में ज्यादा इंट्रेस्टेड दिखता है. व्यभिचार और कुकृत्यों में लिप्त रहने वाले जोसेफ लेलिवेल्ड जैसे लेखकों से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है.


महात्मा गांधी जैसी सुविख्यात और वैश्विक व्यक्तित्व के विरूद्ध कुछ भी अनाप-शनाप लिखना किसी भी शख्सियत को पापुलैरिटी दिला सकने की बड़ी क्षमता रखता है. गांधी जी नस्ल वादी थे ये बात नस्लवाद की रोटी खाने वाला कहे, तो इससे बड़ी बेहयाई क्या होगी. गांधी जी के सत्य के प्रयोगों को व्यभिचार से जोड़ने वालों को ये बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि उनके इस प्रोपैगेंडे से गांधी जी की छवि तो वैसे ही रहेगी लेकिन ऐसे तुच्छ सोच वालों की हालत के बारे में अंदाजा लगाना मुश्किल है. गांधी जी पर बाइसेक्सुअल होने का आरोप तो कोई हिंसक विक्षिप्त ही लगा सकता है लेकिन घृणित लेखक ने अपनी ओर से कोई कसर नहीं उठा रखी है. सही तो ये है इस तरह का आरोप लगा कर उन्होंने ये साबित कर दिया कि उनके अपने देश अमेरिका में व्यभिचार को सदाचार माना जाता है. व्यक्ति अकसर अपनी परिस्थितियों और अपने समाज की मान्यताओं से प्रभावित होता है. अमेरिका सहित अधिकांश विकसित यूरोप के देशों में पुरुष-पुरुष या महिला-महिला के बीच सेक्सुअल संबंध होना सामान्य सी बात है. नीच, कुत्सित और निंदित कर्मों में लिप्त रहने वाले इससे ज्यादा और क्या सोच सकते हैं. उनकी दिनचर्या सेक्स से शुरू होकर सेक्स पर खत्म होती है. माता-पिता, भाई-बहन जैसे रिश्ते इंसानों के बीच होते हैं जानवरों के बीच नहीं. पोर्न फिल्मों का व्यापार करने वाले इंसानों के बीच केवल सेक्स की कल्पना किया करते हैं और हर रिश्ते को बस एक ही नाम देना जानते हैं.


कहा जाता है कि जो जैसा होता है वह वैसा ही सोचता है. तो फिर जोसेफ लेलिवेल्ड कैसे कुछ अलग सोचेंगे. उनकी सोच पर क्रोध की बजाय तरस आता है. सही मायने में वे ऐसे पागलखाने की कोठरी में जाने हकदार हैं जिसमें इंसानी प्रवेश ना होता हो. ऐसी कुत्सित वृत्ति से पीड़ित व्यक्ति का खुलेआम छुट्टा घूमना समाज में तनाव और व्यभिचार को जन्म देने वाला सिद्ध हो सकता है.


महात्मा गांधी नस्लवाद के खिलाफ सारी उम्र लड़े और पूरी दुनियां में नस्लवाद के खिलाफ घृणा उत्पन्न करने में कामयाब हुए. ये बात भी तथाकथित आधुनिक लेखकों को हजम नहीं होती. रही बात महात्मा की छवि की तो ध्यान रहे महापुरुष एक दिन में नहीं बनते और ना ही हवा में उनके कृत्य जन्म लेते हैं. उनका व्यक्तित्व इतना महान होता है कि दुनियां के सारे पापी उनकी शरण में जाकर राहत महसूस कर सकते हैं. गांधी जैसे व्यक्तित्व किसी के आरोप या किसी की प्रशंसा के मोहताज नहीं होते बल्कि वे लोगों के दिलों में इतनी गहराई से बसे होते हैं जिसे निकाल पाना नामुमकिन है.

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

vinod के द्वारा
January 16, 2012

गाँधी जी ने देश के लिए बहूत कुछ किया ||पर कुछ गलतिया भी की ||उन की सब गलतिय माफ़ कर दी जाये..पर में ये माफ़ नहीं कर सकता की नेहरु की धमकी पे उन्होंने सरदार पटेल को कांग्रेस पद से इस्तीफ़ा देने को कहा और कहा की अभी नेहरी सत्ता के लोभ में पागल है..और उसे प्रधान – मंत्री बनाया..किन्तु सरदार पटेल को कोंग्रेस बनाना चाहती थी |पटेल होता तो आज भारत न जाने कहा पहुच गया होता | ये तो गद्दारी की देश के साथ || अपने दोस्त को बनाने के लिए सही उम्मीदवार को अपना वास्ता देकर रोक दिया…वह मेरे राष्ट्र-पिता ||चाहे और आपको माफ़ करदे मैं नहीं करूँगा ||

nikhil के द्वारा
April 1, 2011

पाण्डेय जी , ये केवल सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए किया गया घटिया मानसिकता का प्रयास है .. ऐसे प्रयास होते रहे है काफी समय से.. गाँधी जी पर आप कुछ भी कहे ..आपको कुछ दिन तो सुर्खिया मिलनी तय ही है .. उसी चाहत में अमेरिकी लेखक अपनी दुर्भावनाए उड़ेल रहा है … जब हमारे ही देश में गाँधी पर तमाम तरह के आरोप लगाने वाले लोग दांत फैलाते हुए अनाप शनाप कुछ भी बोलते रहते है तो पूंजी वाद और नस्लवाद का समर्थक उनकी आरती तो नहीं ही गायेगा ….. आप अपने देश में ही देख ले ,,,,,,जो गाँधी को नहीं जानते वे उनके बारे में गलत चीजे ज्यादा बोलते है पर जो उन्हें जानते है वे भी उनके बारे में उलटी सीधी बाते फैलाते है और मिडिया की सुर्खियों में रहते है …. इधर जिस तरह से पश्चिमी भौतिक भूख को हमारे देश में कानून से और हमारी उच्च और बौधिक वर्ग से जो स्वीकृति मिली है उसे उन लोगो को मौका मिल गया है जो हमें पूरी तरह अपने जैसा बना देने .पर उतारू है . और इसके लिए वे हमारे महापुरुषों के चरित्र को ऐसा सनसनीखेज और अपनी इच्छा के अनुरूप बनाकर प्रस्तुत कर रहे है…..जैसे की उनके देश के लोग रहे जिनके नित नए स्कैंडल रोज सुर्खियों में रहते है वैसे ही हमारे देश के महापुरुषों के साथ समानता दिखने के लिए कर रहे है.. और चुकी उनके ऐसे नवीन शोधो में हम भी अपनी बौद्धिकता आंकते है (क्योकि हम समझते है की पश्चिमी लेखक है तो सही ही लिखेगा ).. तो फिर धीरे धीरे हम अपने देश की महान आत्माओं के साथ ऐसे प्रयोग होने देने के लिए खुद ही आत्म समर्पण कर रहे है .. दोषी हमारी मानसिकता भी है .

आर.एन. शाही के द्वारा
March 30, 2011

ऐसे घृणित लोगों की चर्चा करना भी उनके प्रचार अभियान की सफ़लता में सहयोगी होगा । हम उनकी चर्चा से भी परहेज़ करें । साधुवाद ।

chaatak के द्वारा
March 29, 2011

श्री पाण्डेय जी, अमरीकियों की अनैतिकता के बारे में पूरी दुनिया जानती है लेकिन दुर्भाग्यवश सभी उसकी इस अनैतिकता को ही नैतिकता समझकर उसी का अन्धानुकरण कर रहे हैं| अमरीकी समाज सिर्फ और सिर्फ सेक्स, डालर और सामरिक शक्ति को समझता है और इन्ही तीन चीजों के पीछे अंधे होकर भागना अमरीकी संस्कृति का मूल है| आज वह आसानी से गांधीजी को व्यभिचारी सिद्ध कर सकता है क्योंकि विश्व भर के घटिया बौधिक समूह उसकी हाँ में हाँ मिलाने और उसी की बात को पत्थर की लकीर मानने में ही अपनी शान समझते हैं| अपनी मूल संस्कृति को बचाए रखने में अग्रणी मुसलमान उसके पहले शिकार हैं क्योंकि वे खुले आम व्यभिचार की खिलाफत करते हैं और दुसरे रोड़े हैं हम भारतीय जिनकी संस्कृति और महापुरुषों की गलत छवि प्रस्तुत करके ही वह हमारी जड़ों में मट्ठा डाल पायेगा| भारतीय जनमानस को अमरीका की कुत्सित चालों के प्रति आगाह करने के लिए आप बधाई के पात्र हैं| मैं न्यूयॉर्क टाइम्स के पूर्व कार्यकारी संपादक लेखक जोसेफ लेलिवेल्ड की कड़े शब्दों में निंदा करता हूँ| वन्देमातरम !

    vinod के द्वारा
    January 16, 2012

    में भी मानता हु भारतीय संस्कृति की महानता को | अमेरिका कोई अपनी संस्कृति का प्रचार नहीं करता ,ढोल तो हम पिटते है..दुनिया जानती है अंध विश्वास में हम आज भी इलाज नहीं करते..और पूजन करते है..बागवान को क्यों किसी का बैर..अमेरिका की नीतिया गलत है .वो अरब देशो को इस लिए निशाना बना रहा है क्योकि उसे तेल चाहिए ,,,तभी देश बढेगा…आज विकास के लिए उर्जा जरूरी है |आप क्या अनाप सनाप बक रहे है..फालतू ही भर्मित कर रहे है ..आप कह रहे है की प्रसिदी के लिए लोग महापुरुषों की निंदा करते है | भगत सिंह की तो कोई नहीं करता..न शाश्त्री जी की ..गुनाह गर है तभी तो बात आई है |हा मानता हु कुछ लोग इससे अपना स्वार्थ साध रहे है ..अपना देश क्या महान है ..क्या संस्कृति की बात करते है |उनकी अपनी संस्कृति है.दुनिया चाँद पे रहना सिख रही है और भारत आज भी लचर है ..क्योकि हमारे नेता ये नहीं जानते की भविष्य में कैसा समय आएगा |बस अपना मतलब ..|दोल मत पितो महानता का…देश किओ महान बनाने में जुटो|क्यों हम आज विश्व-शक्ति नहीं है |बहार की दुनिया आज भी हमे तीसरी दुनिया के लोग कहते है |में ये नहीं कहता की उनकी संस्कृति अपनावो ..बल्कि अपनी संस्कृति को महान बनाओ…देश को महान कहो मत ..बनाओ..


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