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मातृ संगठन से बड़े होने की सजा

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लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने विविध प्रयासों से भाजपा को वह ऊंचाई दे दी जिससे भाजपा उन्हीं का पर्याय बन कर रह गई. मातृ संगठन को भला यह क्यूं रास आता कि उसके द्वारा नियुक्त सिपहसालार इतने ऊंचे व्यक्तित्व के स्वामी बन जाएं कि आरएसएस भी उनके आभामंडल में छिप जाए. संयोग से अटल बिहारी स्वास्थ्य कारणों से गैर-सक्रिय हो गए जबकि आडवाणी अभी भी सक्रिय हैं. आडवाणी को पीछे धकेलने की आरएसएस की गतिविधि गत सात-आठ सालों से चालू थी जिसमें अब जाकर उसे सफलता मिलती दिखी है.


वस्तुतः मोदी तो कभी मुद्दा थे ही नहीं और भला आडवाणी को मोदी के व्यक्तित्व से क्या परेशानी हो सकती थी! मोदी तो आरएसएस के एक  कार्यकर्ता भर हैं जिनके कद को जानबूझकर इसीलिए आगे बढ़ाने की कोशिश होती रही ताकि आडवाणी के व्यक्तित्व को दबाया जा सके. ऐसे में आरएसएस द्वारा किसी भी साधारण व्यक्ति को आडवाणी के प्रतिरोधक के रूप में आगे बढ़ाया जा सकता था किंतु संयोग से वह व्यक्ति मोदी ही बन गए.


कोई भी संगठन अपने कार्मिकों से आगे बढ़ता है लेकिन वह यह बिलकुल नहीं चाहता कि उसका कोई कार्मिक संगठन से भी आगे बढ़ जाए. अटल-आडवाणी मामले में यही हुआ. दोनों ने कभी भी आरएसएस की उपेक्षा नहीं की, आरएसएस की नीतियों को ही आगे बढ़ाया, हमेशा सच्चे स्वयंसेवक बने रहे लेकिन उनके कार्यों/विशिष्ट उपलब्धियों ने संघ को काफी पीछे धकेल दिया. ऐसे में संघ के पास रास्ता ही क्या बचता? वह या तो ऐसी स्थिति को स्वीकार कर लेता जो व्यवहारिक रूप से संभव नहीं था या फिर आडवाणी के प्रभाव को सीमित करता. संघ ने दूसरी स्थिति चुनी और आडवाणी की राह में कांटे बोने शुरू किए. उसने निरंतर आडवाणी को चेताने की कोशिश की कि उसकी ही चलेगी लेकिन इसमें आडवाणी का विशाल व्यक्तित्व आड़े आता रहा. आडवाणी हथियार डालने को तैयार नहीं दिखते थे तो उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से चेतावनियां भी जारी की जाती रहीं और फिर आखिर में खुले तौर पर मोर्चा खोल दिया गया.


हकीकत ये है कि अब भविष्य में संघ अटल-आडवाणी वाली गलती दोहराने से बचेगा. वह ऐसे ही लोगों को सामने लाएगा जिनकी क्षमता बस एक अच्छे फॉलोवर की हो और जो कभी भी संघ के प्रभाव के लिए खतरा नहीं बनें. ऐसा करके वह ये संदेश दे देना चाहता है कि भाजपा केवल उसकी पॉलिटिकल विंग है न कि एक स्वतंत्र दल और उसके नेतृत्व को केवल उसके आभामंडल तले कार्य करना होगा.


अब सवाल यह उठता है कि संघ आडवाणी के न होने का नुकसान वहन करने के लिए कैसे तैयार है? क्या संघ इसके परिणाम से नावाकिफ है? शायद संघ को यह पूरा अनुमान पहले से ही है कि आगे क्या होने वाला है लेकिन आडवाणी से पीछा छुड़ाने या उनके कद को कम करने के लिए वह किसी भी कीमत को चुकाने के लिए तैयार है. उसे पता है कि बिना आडवाणी के 2014 का चुनाव तो दूर की कौड़ी है उसे इससे भी काफी बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है लेकिन उसने तय कर लिया होगा कि जो भी परिणाम होगा उसे भुगतेंगे.




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