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बिना प्रतिवाद, बहस और विचार के 'विशुद्ध भक्ति'

Posted On: 11 Nov, 2013 Politics में

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राजनैतिक विद्रूपता का ये दौर थोड़ा विचलित करता है जबकि ”पार्टी विथ अ डिफरेंस’ का ढोंग रचाने वाली भाजपा के भावी प्रधानमंत्री तथा वर्तमान में प्रधानमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार नरेंद्र मोदी पर कोई भी चर्चा या छिद्रांवेषण उनके समर्थकों को रास नहीं आती और वे एक सुर में गाली-गलौज, मानसिक उत्पीड़न का चक्र आरम्भ कर देते हैं। मोदी के समर्थकों का ये उन्मादी रवैया गैर-लोकतांत्रिक और काफी हद तक व्यक्ति पूजा से ग्रसित है। वे लोकतंत्र के इस सामान्य नियम को भी उपेक्षित कर देते हैं कि बहस-विमर्श-वाद विवाद ही स्वस्थ राजनैतिक प्रक्रिया को सुचारु रूप से आगे बढ़ाते हैं, अन्यथा की स्थिति एक तानाशाही संकट को जन्म देती है। अभी फिलहाल सोशल मीडिया, ब्लॉगिग साइटें तथा अन्य प्रचार व संपर्क माध्यम मोदी समर्थकों की अंधभक्ति से सराबोर हैं तथा ये समर्थक विरोधी मत वालों की भद्द पीटने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।


आलम ये है कि संवाद तो हो ही नहीं सकता। मोदी समर्थक शायद ये अच्छी तरह जानते हैं कि संवाद का अर्थ होगा कलई खुल जाना या फिर उन्हें इस बात का डर है कि सार्थक संवाद की स्थिति में उनके पास मोदी के बचाव के लिए कोई तर्क नहीं होगा तो ऐसे में अच्छा है कि पहले ही विरोधी मत वालों की ऐसी-तैसी कर दी जाए और बातचीत की सारी गुंजाइश खत्म कर दी जाए। हालांकि ऐसा करते हुए मोदी समर्थक ये भूल जाते हैं कि उनका ये कृत्य राष्ट्र में मोदी की छवि को ही दूषित रूप में सामने ला रहा है। ऐसा कैसे हो सकता है कि उनके समर्थक जो उनके बारे में सोचते हैं वही पूरा देश भी सोचे। मोदी भक्त जैसे जिस रूप में मोदी को सामने लाना चाहते हैं वैसे ही बाकी देश भी स्वीकार कर ले – बिना प्रतिवाद, बिना बहस और बिना विचार के।


आखिर आप कैसी राजनीति चाहते हैं इस देश में? क्या देश व्यक्ति पूजक राजनीति को प्रधानता देने लगे? क्या लोग मत-मतांतरों को दरकिनार करके फासिस्ट हो जाएं और वही मानें और मनवाएं जो उन्हें पसंद है? क्या लोकतंत्र को व्यक्तिपरक एकतंत्रीय शासन पद्धति में बदल देना चाहिए? क्या अब इस देश में विरोधी मतों का सम्मान होना बंद हो जाएगा?


अगर उपरोक्त सवालों के जवाब ‘हां’ में हैं तो फिर ऐसी राजनीति और ऐसे समर्थक देश के खिलाफ हैं, देश हित के विरुद्ध हैं तथा सबसे बढ़कर अराजकता को जन्म देने वाले हैं। जो समर्थक ये तक नहीं जानते कि उनकी अंधी तथा विवेकहीन उन्माद भरी भक्ति से उनके ही नेता की छवि दूषित हो रही है उनकी ऐसी भक्ति उनके नेता के राजनैतिक अस्तित्व को ही खत्म करने वाली सिद्ध हो सकती है।



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